मुख्य तथ्य
- व्यक्ति
- मधुरी दास, 49 वर्ष, तांती पाथर गांव, असम
- उत्पाद
- देहिंग पत्कई पिकल्स – आम, बांस की टहनी, हाथी सेब, राजा मिर्च आदि
- बिक्री अवधि
- जनवरी-जून 2026
- बिक्री मूल्य
- ₹20,000 से अधिक
- सहयोगी संस्थाएं
- आरन्यक, ब्रिटिश एशियन ट्रस्ट, एलिफेंट फैमिली, डार्विन इनिशिएटिव
- पहल
- ज़ुपान सामुदायिक बाजार संपर्क
पृष्ठभूमि
असम के पूर्वी हिस्से में देहिंग पत्कई राष्ट्रीय उद्यान के किनारे बसे तांती पाथर गांव की 49 वर्षीय मधुरी दास हर रविवार सुबह जेपुर साप्ताहिक बाजार में आम, बांस की टहनी, हाथी सेब और राजा मिर्च (भूत जोलोकिया) के अचार के जार सजाती हैं। हर जार पर 'देहिंग पत्कई पिकल्स' का लेबल होता है।
वर्षों तक गांव की जिंदगी अनिश्चितता से भरी रही। हाथी खेतों में विचरण करते थे और एक रात में पूरी फसल बर्बाद कर सकते थे। 2021 में देहिंग पत्कई को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किए जाने के बाद वन संसाधनों पर निर्भर गतिविधियां अवैध हो गईं, जिससे स्थानीय आजीविका पर दोहरा संकट आ गया।
वर्तमान स्थिति
मधुरी अकेले रहती हैं और पहले दिहाड़ी मजदूरी करती थीं। वह अचार बनाना जानती थीं, लेकिन उनके पास उपकरण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार नहीं था। आरन्यक, ब्रिटिश एशियन ट्रस्ट और एलिफेंट फैमिली ने डार्विन इनिशिएटिव के तहत उन्हें मिक्सर ग्राइंडर, सीलिंग मशीन, जार, पैकेजिंग सामग्री और कच्चा माल उपलब्ध कराया।
संगठनों ने उन्हें उत्पाद प्रस्तुति, वित्तीय रिकॉर्ड और बाजार संपर्क का प्रशिक्षण दिया। 'देहिंग पत्कई पिकल्स' ब्रांड से स्थानीय दुकानों और साप्ताहिक बाजारों में उनके उत्पाद बिकने लगे। 'ज़ुपान' जैसी सामुदायिक बाजार पहल से उनके ग्राहक गांव से बाहर भी बढ़े। जनवरी से जून 2026 के बीच उन्होंने बेर, लहसुन, मिक्स सब्जी, हाथी सेब, मिर्च, आम, गार्सिनिया, राजा मिर्च और बांस की टहनी के अचार की 20,000 रुपये से अधिक की बिक्री की।
प्रभाव
मधुरी अब आसपास के गांवों से फल और सब्जियां खरीदती हैं, और हाथी सेब, गार्सिनिया, बांस की टहनी जैसी मौसमी उपज स्थानीय लोगों से मंगवाती हैं। इससे उन्होंने एक छोटी स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला बनाई है, जिसमें अन्य लोग भी कमाते हैं।
अचार का व्यवसाय हाथियों को गांव से नहीं रोक सकता, लेकिन यह सुनिश्चित करता है कि हाथी के हमले से परिवार की आय का एकमात्र स्रोत नष्ट न हो। इससे समुदायों में हाथियों के प्रति सहनशीलता बनी रहती है और संरक्षण कानूनों को स्वीकार करना आसान होता है।
भविष्य की संभावनाएं
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
यदि इसी तरह की पहल असम के मानव-हाथी संघर्ष वाले क्षेत्रों के सैकड़ों परिवारों तक पहुंचती है, तो हर गांव अपनी ताकत पहचान सकता है – अचार बनाने वाले, बुनकर, मशरूम उत्पादक, कुम्हार, नींबू किसान। इससे वनों पर निर्भरता घट सकती है और संघर्ष के आर्थिक झटके कम हो सकते हैं।
हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इस मॉडल को कितने परिवारों तक विस्तारित किया जा सकता है और क्या यह दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ होगा। यदि बाजार संपर्क और प्रशिक्षण जारी रहता है, तो ऐसे उद्यम स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं। लेकिन अगर समर्थन बंद हो जाता है, तो इन उद्यमों की स्थिरता पर खतरा मंडरा सकता है।
स्रोत: theshillongtimes.com



