श्रीलंका में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के कार्यकाल को बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन की तैयारी है। महान्यायवादी ने इस संशोधन पर अपनी स्पष्ट राय दे दी है, जिससे संकेत मिलता है कि सरकार इस दिशा में आगे बढ़ेगी।
संविधान संशोधन को लेकर चल रहे विवाद के बीच विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला बेहद गंभीर है और इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। संविधान किसी भी देश का मूल कानून होता है, जो सभी नागरिकों से जुड़ा होता है, न कि केवल सत्ता में बैठे लोगों से।
संविधान संशोधन की प्रक्रिया के तहत संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, कुछ महत्वपूर्ण संशोधनों के लिए जनमत संग्रह की मंजूरी भी जरूरी होती है। अनुच्छेद 123 के तहत सुप्रीम कोर्ट को यह निर्धारित करने का अधिकार है कि किसी संशोधन के लिए जनमत संग्रह की आवश्यकता है या नहीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह संशोधन सीधे तौर पर न्यायपालिका के कुछ सदस्यों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से है। किसी भी सभ्य समाज में यह सिद्धांत पवित्र है कि कोई भी अपने मामले का न्यायाधीश नहीं हो सकता। ऐसे में यदि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश इस मामले पर फैसला देते हैं, तो यह सिद्धांत का उल्लंघन होगा।
इसलिए, सुप्रीम कोर्ट को अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए यह सिफारिश करनी चाहिए कि इस संशोधन को जनमत संग्रह में भेजा जाए। साथ ही, सरकार भी चाहे तो इसे सीधे जनमत संग्रह में भेज सकती है, जिससे न्यायपालिका की गरिमा बनी रहेगी।
स्रोत: dailymirror.lk



