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भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लिए गहरे वित्तीय बाजारों की आवश्यकता: RBI डिप्टी गवर्नर

RBI डिप्टी गवर्नर रोहित जैन ने कहा कि विकसित भारत के लिए दीर्घकालिक पूंजी जुटाने हेतु बैंक-आधारित मॉडल के साथ बाजार-आधारित वित्त को मजबूत करना होगा। उन्होंने गहरे, व्यापक और लचीले बाजारों की आवश्यकता पर बल दिया।

मुख्य तथ्य

वक्ता
श्री रोहित जैन, डिप्टी गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक
अवसर
वित्तीय संस्थान नेतृत्व सम्मेलन, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक द्वारा आयोजित
स्थान
मुंबई
तिथि
24 जुलाई 2026
लक्ष्य वर्ष
2047 (विकसित अर्थव्यवस्था)
मुख्य संदेश
बैंक-आधारित वित्त के साथ बाजार-आधारित वित्त को मजबूत करने की आवश्यकता

पृष्ठभूमि

मुंबई, 27 जुलाई (वाणिज्यिक समाचार) – भारतीय रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर श्री रोहित जैन ने 24 जुलाई 2026 को स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक द्वारा आयोजित वित्तीय संस्थान नेतृत्व सम्मेलन में कहा कि भारत को 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लिए अपने वित्तीय बाजारों को गहरा, व्यापक और अधिक लचीला बनाना होगा। उन्होंने कहा कि बैंक-आधारित वित्तपोषण मॉडल ने अर्थव्यवस्था की अच्छी सेवा की है, लेकिन विकसित भारत के लिए आवश्यक वित्तपोषण का पैमाना, अवधि और विविधता अकेले बैंक बैलेंस शीट से पूरी नहीं हो सकती।

श्री जैन ने कहा कि पिछले तीन दशकों में भारत के वित्तीय बाजारों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है, जिसमें प्रशासित ब्याज दरों और विनिमय दरों से हटकर बाजार-निर्धारित मूल्य निर्धारण, नीलामी-आधारित सरकारी उधारी, आधुनिक बेंचमार्क और परिष्कृत ट्रेडिंग, क्लियरिंग और सेटलमेंट बुनियादी ढांचे की ओर बढ़ना शामिल है। उन्होंने वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों में भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों को शामिल करने को वैश्विक पूंजी के साथ एकीकरण का महत्वपूर्ण कदम बताया।

वर्तमान स्थिति

डिप्टी गवर्नर ने कहा कि भारत का सरकारी प्रतिभूति बाजार अब रुपये की वित्तीय परिसंपत्तियों के लिए मूल्य निर्धारण की रीढ़ प्रदान करता है। मुद्रा, विदेशी मुद्रा और डेरिवेटिव बाजारों का काफी विस्तार हुआ है, और निवेशक तथा प्रतिभागी आधार में लगातार वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि यह प्रगति भारत के बाजार विकास के लिए कैलिब्रेटेड दृष्टिकोण को दर्शाती है, जो व्यापक खुलेपन और नवाचार को व्यापक आर्थिक स्थिरता, लचीले संस्थानों और मजबूत बाजार बुनियादी ढांचे के साथ जोड़ती है।

श्री जैन ने कहा कि आने वाले दशकों की मांग काफी अधिक होगी। भारत को बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, शहरी विकास, प्रौद्योगिकी और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय उद्यमों के विस्तार के लिए दीर्घकालिक पूंजी की आवश्यकता होगी। उन्होंने कहा कि घरेलू बचत का पैटर्न भी विकसित हो रहा है, जिसमें बैंक जमा के साथ-साथ बीमा, पेंशन, म्यूचुअल फंड और अन्य बाजार-लिंक्ड साधनों के माध्यम से घरेलू बचत का एक बढ़ता हुआ हिस्सा प्रवाहित हो रहा है।

वित्तीय बाजार खंड और उनके कार्य
बाजार खंड कार्य
सरकारी प्रतिभूति बाजारसार्वजनिक निवेश का वित्तपोषण और बेंचमार्क प्रदान करना
कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजारदीर्घकालिक बचत को निजी निवेश से जोड़ना
मुद्रा बाजारमौद्रिक संचरण और तरलता प्रबंधन को मजबूत करना
विदेशी मुद्रा और डेरिवेटिव बाजारजोखिम प्रबंधन की सुविधा
स्रोत: RBI डिप्टी गवर्नर का भाषण, 24 जुलाई 2026

प्रभाव

डिप्टी गवर्नर ने कहा कि वित्तीय बाजारों के विभिन्न खंड पूरक कार्य करते हैं। सरकारी प्रतिभूति बाजार सार्वजनिक निवेश का वित्तपोषण करते हैं और अन्य रुपया परिसंपत्तियों के मूल्य निर्धारण के लिए बेंचमार्क प्रदान करते हैं। कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार दीर्घकालिक बचत को निजी निवेश से जोड़ते हैं। मुद्रा बाजार मौद्रिक संचरण और तरलता प्रबंधन को मजबूत करते हैं। विदेशी मुद्रा और डेरिवेटिव बाजार व्यवसायों, वित्तीय संस्थानों और निवेशकों को जोखिम प्रबंधन की सुविधा देते हैं।

इसका सीधा प्रभाव उन सभी संस्थाओं पर पड़ेगा जो पूंजी जुटाती हैं या जोखिम का प्रबंधन करती हैं, जिनमें सरकारें, कॉर्पोरेट, बैंक, निवेशक और आम बचतकर्ता शामिल हैं। गहरे बाजारों से दीर्घकालिक परियोजनाओं के लिए अधिक पूंजी उपलब्ध हो सकती है, जिससे बुनियादी ढांचे और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों को लाभ हो सकता है। साथ ही, बेहतर जोखिम वितरण से वित्तीय प्रणाली में स्थिरता आ सकती है।

भविष्य का परिदृश्य

विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।

श्री जैन ने कहा कि भारत के वित्तीय बाजारों को अगले दो दशकों में किस तरह का आकार देना है, यह एक केंद्रीय प्रश्न है। उन्होंने तीन प्रस्ताव रखे: पहला, भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के लिए वित्तीय बाजारों को काफी अधिक दीर्घकालिक पूंजी जुटाने और जोखिम को अधिक कुशलता से वितरित करने की आवश्यकता है। दूसरा, अगली चुनौती केवल बाजारों को बड़ा बनाना नहीं, बल्कि उन्हें गहरा, व्यापक और अधिक लचीला बनाना है। तीसरा, यह परिवर्तन अकेले नियामक द्वारा नहीं किया जा सकता; इसके लिए वित्तीय बाजार पारिस्थितिकी तंत्र में समन्वित प्रयास की आवश्यकता है।

यदि ये प्रयास सफल रहते हैं, तो भारत वैश्विक वित्तीय प्रणाली में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है और विकसित अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। हालांकि, यदि बाजारों की गहराई और लचीलापन पर्याप्त रूप से विकसित नहीं होता है, तो दीर्घकालिक पूंजी की कमी और जोखिम प्रबंधन में कठिनाइयाँ आ सकती हैं। यह भी संभावना है कि नियामक और बाजार सहभागियों के बीच समन्वय के अभाव में परिवर्तन धीमा हो सकता है।

स्रोत: Reserve Bank of India

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