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‘हम चुप नहीं रहेंगे’: रविकरण ने बालराज और पांडारा वन्नियान की स्मृति जारी रखने का संकल्प लिया

इलंकई तमिल अरासु कच्ची के सांसद थुरैरासा रविकरण ने पांडारा वन्नियान और एलटीटीई कमांडर बालराज जैसी तमिल हस्तियों की स्मृति को 'ऐतिहासिक कर्तव्य' बताते हुए विरोध के बावजूद श्रद्धांजलि जारी रखने की प्रतिज्ञा की।

मुख्य तथ्य

वक्ता
थुरैरासा रविकरण, आईटीएके सांसद, वन्नी जिला
घटना स्थल
मुत्त्रावेली मैदान, मुल्लैतीवु
तारीख
2 अगस्त 2026
ऐतिहासिक संदर्भ
अगस्त 1803 में पांडारा वन्नियान का ब्रिटिश सेना पर हमला
विवाद
मई में संसद में बालराज को श्रद्धांजलि देने पर आलोचना
स्मृति दिवस
25 अगस्त (पांडारा वन्नियान)

पृष्ठभूमि

इलंकई तमिल अरासु कच्ची (आईटीएके) के संसद सदस्य थुरैरासा रविकरण ने कहा है कि वन्नी राजा पांडारा वन्नियान और एलटीटीई कमांडर बालराज जैसी तमिल हस्तियों की स्मृति में श्रद्धांजलि देना एक 'ऐतिहासिक कर्तव्य' है। उन्होंने सिंहली राजनेताओं और सिंहली-बौद्ध समुदाय के कुछ वर्गों के विरोध के बावजूद यह प्रतिज्ञा दोहराई।

रविकरण ने मई में श्रीलंकाई संसद में बालराज को श्रद्धांजलि देने के बाद हुए विवाद को याद किया, जब कई विपक्षी सांसदों और बहुसंख्यक सिंहली-बौद्ध समुदाय के सदस्यों ने उनकी टिप्पणी की कड़ी आलोचना की थी।

वर्तमान स्थिति

2 अगस्त को मुल्लैतीवु के मुत्त्रावेली मैदान में पारंपरिक तमिल मार्शल आर्ट के अभ्यासकर्ताओं को सम्मानित करने वाले एक कार्यक्रम में बोलते हुए, वन्नी जिले के सांसद ने कहा कि वे आलोचना से विचलित नहीं होंगे। उन्होंने कहा, "हम स्मरण का अपना ऐतिहासिक कर्तव्य पूरा करते रहेंगे। हम किसी के चिल्लाने से डरकर ऐसी स्मृतियों को अंजाम दिए बिना चुप नहीं रहेंगे।"

कार्यक्रम में तलवार और ढाल के प्रदर्शन पर टिप्पणी करते हुए रविकरण ने पांडारा वन्नियान के नेतृत्व में ब्रिटिश औपनिवेशिक ताकतों के खिलाफ वन्नी में हुए प्रतिरोध से समानता खींची। उन्होंने कहा कि अगस्त 1803 में, लगभग 223 साल पहले, पांडारा वन्नियान ने मुल्लैतीवु में तैनात ब्रिटिश सेना पर हमला किया, उनके कब्जे वाले डच किले में घुसे और उनकी तोपें छीन लीं।

प्रभाव

रविकरण के बयान से तमिल समुदाय के बीच स्मृति और पहचान की राजनीति पर बहस छिड़ सकती है, जबकि सिंहली-बौद्ध बहुल देश में यह विवादास्पद बना हुआ है। उनकी टिप्पणी से संसद में और सार्वजनिक मंचों पर ध्रुवीकरण बढ़ सकता है, जिससे तमिल राजनीतिक दलों और सरकार के बीच तनाव बढ़ सकता है।

तमिल स्मरण के स्थलों को निशाना बनाए जाने की पृष्ठभूमि में, रविकरण का यह रुख तमिल समुदाय के लिए प्रतीकात्मक महत्व रखता है, लेकिन इससे आतंकवाद निरोधक अधिनियम (पीटीए) के तहत कानूनी कार्रवाई का जोखिम भी बढ़ सकता है।

भविष्य की संभावनाएँ

विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।

यदि रविकरण और अन्य तमिल नेता इसी तरह की स्मृतियाँ आयोजित करते रहे, तो सरकार और सिंहली राष्ट्रवादी समूहों से और कड़ी प्रतिक्रिया हो सकती है, जिससे राजनीतिक गतिरोध गहरा सकता है।

वैकल्पिक रूप से, यदि सरकार तमिल स्मरण के मुद्दे पर संवाद शुरू करती है, तो इससे तनाव कम हो सकता है, लेकिन इसकी संभावना कम दिखती है।

आगामी 25 अगस्त को पांडारा वन्नियान की वार्षिक स्मृति के दौरान स्थिति और स्पष्ट हो सकती है, जब रविकरण या अन्य लोग सार्वजनिक रूप से श्रद्धांजलि दे सकते हैं।

स्रोत: tamilguardian.com

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