मुख्य तथ्य
- बिना बीमा वाले वाहनों का प्रतिशत
- लगभग 56 प्रतिशत
- कुल वाहन
- 30.48 करोड़
- बिना बीमा वाले वाहन
- 16.54 करोड़
- नई कारों के लिए बीमा अवधि
- चार साल (निर्देशित)
- नए दोपहिया वाहनों के लिए बीमा अवधि
- छह साल (निर्देशित)
- पायलट प्रोजेक्ट का उद्देश्य
- बिना बीमा वाले वाहनों को पेट्रोल पंप पर ईंधन देने से मना करना
पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 146 के तहत सभी वाहनों के लिए अनिवार्य थर्ड पार्टी बीमा के प्रावधानों का पालन न होने पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि संसद की स्थायी समिति की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 56 प्रतिशत वाहन बिना बीमा के चल रहे हैं।
अदालत ने 2018 में दिए गए अपने पिछले आदेश का उल्लेख किया, जिसमें नई कारों के लिए तीन साल और दोपहिया वाहनों के लिए पांच साल का थर्ड पार्टी बीमा खरीदना अनिवार्य किया गया था। इसके बावजूद, आठ साल बीत जाने के बाद भी बड़ी संख्या में वाहन बिना बीमा के पाए जाते हैं।
वर्तमान स्थिति
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDA) और सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के परामर्श से एक पायलट प्रोजेक्ट तैयार किया जाए, जिसमें वाहन के वैध बीमा की स्थिति से ईंधन की आपूर्ति को जोड़ा जाए। बिना वैध बीमा के वाहन को पेट्रोल पंप पर ईंधन देने से मना कर दिया जाए।
अदालत ने कहा कि ईंधन देने से इनकार करने से दोहरा लाभ होगा: पहला, बिना बीमा या बिना पंजीकृत वाहनों की पहचान हो सकेगी; दूसरा, वाहन मालिकों को वैध बीमा कराने के लिए प्रेरित किया जा सकेगा। पीठ ने कहा कि यह काम स्वचालित नंबर प्लेट पहचान (ANPR) कैमरों के माध्यम से किया जा सकता है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने इस पर सैद्धांतिक रूप से कोई आपत्ति नहीं जताई है।
| विवरण | मान |
|---|---|
| बिना बीमा वाले वाहनों का प्रतिशत | लगभग 56 प्रतिशत |
| कुल वाहन | 30.48 करोड़ |
| बिना बीमा वाले वाहन | 16.54 करोड़ |
| नई कारों के लिए बीमा अवधि (निर्देशित) | चार साल |
| नए दोपहिया वाहनों के लिए बीमा अवधि (निर्देशित) | छह साल |
प्रभाव
अदालत ने कहा कि वर्तमान में 30.48 करोड़ वाहनों में से 16.54 करोड़ वाहन बिना बीमा के हैं। इसका सीधा असर सड़क दुर्घटना पीड़ितों के मुआवजे पर पड़ता है, जिसमें देरी होती है या कई बार मुआवजा मिल ही नहीं पाता। पीड़ितों और उनके परिवारों को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।
यदि पीड़ित की मृत्यु हो जाती है या वह स्थायी रूप से विकलांग हो जाता है, तो परिवार पर वित्तीय बोझ और भी अधिक बढ़ जाता है। अदालत ने कहा कि बीमा का उद्देश्य न केवल पीड़ितों को मुआवजा देना है, बल्कि उन्हें लंबी कानूनी प्रक्रिया से बचाना भी है।
आगे की राह
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
अदालत ने IRDA को निर्देश दिया है कि वह नई कारों के लिए चार साल और नए दोपहिया वाहनों के लिए छह साल का थर्ड पार्टी बीमा अनिवार्य करे। यदि IRDA ऐसा करता है, तो नए वाहन खरीदने वालों को अधिक अवधि के लिए बीमा कराना होगा।
अदालत ने IRDA और MoRTH को कुछ राज्यों में ANPR कैमरे लगाने का निर्देश दिया है, जो बीमा सूचना ब्यूरो और वाहन पोर्टल के डेटा से जुड़े होंगे। इससे बिना बीमा वाले वाहनों के खिलाफ स्वचालित ई-चालान जारी किए जा सकेंगे। राज्य पुलिस को हैंडहेल्ड डिवाइस या ऐप उपलब्ध कराए जाने की भी बात कही गई है।
यदि ये उपाय लागू होते हैं, तो सड़क दुर्घटना पीड़ितों को समय पर मुआवजा मिलने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, इन निर्देशों के क्रियान्वयन की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य सरकारें और संबंधित एजेंसियां इन्हें कितनी प्रभावी ढंग से लागू करती हैं।
स्रोत: newindianexpress.com
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बीमा स्थिति: कुल वाहन बनाम बिना बीमा वाले वाहन
बिना बीमा वाले वाहन16.54 करोड़
सटीक आंकड़े देखें
| श्रेणी | वाहनों की संख्या |
|---|---|
| कुल वाहन | 30.48 करोड़ |
| बिना बीमा वाले वाहन | 16.54 करोड़ |
स्रोत:स्रोत: सुप्रीम कोर्ट के अवलोकन के अनुसार, संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट 2024-25। स्रोत-समर्थित



