मुख्य तथ्य
- क्षेत्र
- मार्नेउली, जॉर्जिया
- समुदाय
- जातीय अज़रबैजानी, अर्मेनियाई, जॉर्जियाई
- 2020 युद्ध की अवधि
- 44 दिन
- 2023 आक्रमण की अवधि
- 24 घंटे
- विस्थापित अर्मेनियाई
- 100,000 से अधिक
- यूरोपीय संसद प्रस्ताव
- 5 अक्टूबर, 2023
पृष्ठभूमि
मार्नेउली, जॉर्जिया का एक क्षेत्र, जातीय अज़रबैजानियों और अर्मेनियाई लोगों का घर है, जो जॉर्जिया के नागरिक भी हैं। इसके कई गांवों में वे जॉर्जियाई लोगों के साथ-साथ रहते हैं। पिछले कुछ वर्षों में यह क्षेत्र और इसके सह-आबादी वाले गाँव शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का एक प्रमुख उदाहरण बन गए हैं।
यह क्षेत्र दशकों से अंतर-सांस्कृतिक संघर्ष और आदिवासीवाद देख चुका है। 1990 के दशक की शुरुआत में लड़े गए युद्ध के बाद से नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र एक स्व-घोषित राज्य के रूप में अपनी जातीय अर्मेनियाई आबादी के नियंत्रण में रहा है, जो 1994 में युद्धविराम और अर्मेनियाई सैन्य जीत के साथ समाप्त हुआ। पहले युद्ध के बाद, एक नया, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैर-मान्यता प्राप्त, वास्तविक नागोर्नो-काराबाख गणराज्य की स्थापना की गई। सात निकटवर्ती क्षेत्रों पर अर्मेनियाई सेनाओं का कब्ज़ा हो गया।
2020 में आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच दूसरा युद्ध हुआ जो 44 दिनों तक चला। उस युद्ध ने इस क्षेत्र की स्थिति बदल दी। अज़रबैजान ने पहले से कब्जे वाले सात क्षेत्रों में से अधिकांश पर नियंत्रण हासिल कर लिया और कराबाख के एक तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया।
वर्तमान स्थिति
19 सितंबर, 2023 को, अज़रबैजान ने पूर्व विवादित नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र में एक सैन्य आक्रमण शुरू किया। आक्रमण 24 घंटे तक चला और वास्तव में राज्य की राजधानी स्टेपानाकर्ट/खानकेंडी की सरकार के 20 सितंबर को अजरबैजान और रूस द्वारा उल्लिखित युद्धविराम समझौते को स्वीकार करते हुए आत्मसमर्पण करने के साथ समाप्त हुआ। 28 सितंबर को, नागोर्नो-काराबाख की सरकार ने घोषणा की कि वह 2024 तक खुद को भंग कर देगी।
20 सितंबर से 100,000 से अधिक जातीय अर्मेनियाई लोग इस क्षेत्र से भाग गए हैं। इस बीच, यूरोपीय संसद ने 5 अक्टूबर को एक प्रस्ताव अपनाया, जिसमें “अनुचित सैन्य हमले” की निंदा की गई और कहा गया कि हमला “अंतर्राष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों का उल्लंघन था।”
कार्नेगी यूरोप के एक वरिष्ठ साथी, इस क्षेत्र के लंबे समय तक पर्यवेक्षक और “The Black Garden: Armenia and Azerbaijan through Peace and War” पुस्तक के लेखक टॉम डी वाल ने शत्रुता के अपने विश्लेषण में लिखा, “जब से यह संघर्ष शुरू हुआ है, तब से कूटनीति ने नहीं, बल्कि ताकत ने इस संघर्ष की दिशा तय की है।”
| वर्ष | घटना | अवधि/संख्या |
|---|---|---|
| 1994 | युद्धविराम और अर्मेनियाई सैन्य जीत | — |
| 2020 | दूसरा युद्ध | 44 दिन |
| 2023 | सैन्य आक्रमण | 24 घंटे |
| 2023 | विस्थापित अर्मेनियाई | 100,000+ |
प्रभाव
मार्नेउली जैसी जगहें दर्शाती हैं कि संघर्ष क्षेत्र के बाहर शांति की कहानी संभव है। यहां के निवासी आपसी सम्मान और समझ की भाषा बोलते हैं, और कोई नहीं पूछता कि आप कहां से हैं। जॉर्जियाई निवासी रज़डेन जुजुनाश्विली ने बताया, “हम एक साथ शादियों में जाते हैं और एक साथ अंतिम संस्कार में शामिल होते हैं। हम एक साथ पीते हैं और खाते हैं।”
एक अन्य जॉर्जियाई निवासी, रेज़ो कुपाताज़दे, जो अज़रबैजानी में भी पारंगत हैं, कहते हैं कि सभी तीन समुदाय एक साथ अच्छी तरह से रहते हैं और एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। यह सहअस्तित्व उन लोगों के लिए एक सबक है जो संघर्ष क्षेत्र में रहते हैं।
मार्नेउली की एक जातीय अर्मेनियाई मिशा असलिक्यान, जो अज़रबैजानी, रूसी और जॉर्जियाई भाषा में पारंगत हैं, ने दूसरे कराबाख युद्ध के दौरान एक प्रकरण साझा किया। उन्होंने बोल्निसी के तीन जातीय अज़रबैजानी पुरुषों को सवारी दी। जब उन्होंने बताया कि वह अर्मेनियाई हैं, तो वे चौंक गए और माफ़ी मांगी। यह घटना दिखाती है कि आम लोगों के बीच संवाद से गलतफहमियां दूर हो सकती हैं।
भविष्य की संभावनाएं
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
मिशा असलिक्यान का मानना है कि एक इंच ज़मीन, एक भी राजनीतिक बयान, एक भी विचारधारा मानव जीवन की कीमत के बराबर नहीं है। वह कहती हैं, “मैं हमेशा शांति के पक्ष में हूं और विश्वास करती हूं कि चाहे किसी को भी कोई भी समस्या हो, आप उन्हें बातचीत की मेज पर सुलझा सकते हैं।”
फिलहाल मीशा की ख्वाहिशें दिवास्वप्न ही हैं। 4 अक्टूबर को, अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने ग्रेनाडा की अपनी यात्रा रद्द कर दी, जहां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री स्तर की बैठक होनी थी। यदि यह बैठक होती, तो शांति वार्ता को गति मिल सकती थी।
यदि मार्नेउली जैसे उदाहरणों से प्रेरणा ली जाए, तो आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच आपसी समझ विकसित हो सकती है। हालांकि, यदि तनाव जारी रहा, तो शांति की संभावना कम हो सकती है। यह देखना बाकी है कि क्या दोनों देश बातचीत की मेज पर लौटेंगे या फिर ताकत का रुख अपनाएंगे।



