मुख्य तथ्य
- घटना
- 1992 के चुनाव के बाद दाताओं ने फंडिंग रोकी
- परिणाम
- अर्थव्यवस्था का पूर्ण उदारीकरण
- सुधार
- विनिमय नियंत्रण और आयात लाइसेंसिंग समाप्त
- राजनीतिक बदलाव
- संविधान की धारा 2ए निरस्त, एक-दलीय प्रणाली समाप्त
- वक्ता
- पूर्व सीबीके गवर्नर एरिक कोटुट
पृष्ठभूमि
नैरोबी, 4 अगस्त: केन्या के सेंट्रल बैंक (सीबीके) के पूर्व गवर्नर एरिक कोटुट ने खुलासा किया है कि 1992 के आम चुनाव के बाद विकास साझेदारों ने फंडिंग रोक दी थी, जिससे विदेशी वित्तीय प्रवाह में तेजी से कमी आई और केन्या को अपनी अर्थव्यवस्था उदारीकरण के लिए मजबूर होना पड़ा।
सीबीके गवर्नर्स सीरीज़ में बोलते हुए कोटुट ने कहा कि सरकार और दाताओं के बीच व्यापक आर्थिक सुधारों को लागू करने पर सहमति बनी, जिसमें विनिमय नियंत्रण और आयात लाइसेंसिंग को समाप्त करना शामिल था।
वर्तमान स्थिति
कोटुट ने कहा, "चुनाव के बाद और नई सरकार के गठन के बाद, दाताओं के साथ मिलकर स्थिति की समीक्षा की गई और सहमति बनी कि सरकार अर्थव्यवस्था को पूरी तरह उदारीकृत करेगी।" उन्होंने कहा, "इसलिए उन्होंने विनिमय नियंत्रण समाप्त कर दिया, आयात लाइसेंसिंग समाप्त कर दी, और कई अन्य चीजें समाप्त कीं।"
कोटुट ने कहा कि ये सुधार राजनीतिक बदलावों के साथ मेल खाते थे, जिसमें संविधान की धारा 2ए को निरस्त करना शामिल था, जिससे एक-पक्षीय प्रणाली समाप्त हुई और विपक्षी दलों के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ। उन्होंने कहा, "लेकिन यह एक पार्टी से शुरू हुआ। इसे फोर्ड कहा जाता था।"
प्रभाव
इन सुधारों का सीधा असर केन्या की अर्थव्यवस्था पर पड़ा, क्योंकि विनिमय नियंत्रण और आयात लाइसेंसिंग को समाप्त करने से व्यापार और निवेश के नियम बदल गए। इससे विदेशी निवेश और आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि की संभावना बनी, हालांकि इसके साथ ही घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
राजनीतिक रूप से, धारा 2ए के निरस्त होने से बहुदलीय लोकतंत्र की स्थापना हुई, जिससे राजनीतिक दलों का गठन संभव हुआ। इससे केन्या की राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव आया और नागरिकों को अधिक राजनीतिक विकल्प मिले।
भविष्य की संभावनाएँ
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
यदि केन्या सुधारों की इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो अर्थव्यवस्था में और अधिक उदारीकरण हो सकता है, जिससे विदेशी निवेश और व्यापार को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि, यदि सरकार नीतिगत स्थिरता बनाए रखने में विफल रहती है, तो आर्थिक सुधारों की गति धीमी पड़ सकती है।
आगे चलकर, यदि दाता देशों के साथ संबंध मजबूत होते हैं, तो केन्या को अधिक वित्तीय सहायता मिल सकती है, लेकिन यदि राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है, तो दाताओं का दबाव फिर से बढ़ सकता है। यह देखना बाकी है कि केन्या इन चुनौतियों का सामना कैसे करता है।
स्रोत: capitalfm.africa



