मुख्य तथ्य
- मामला
- एशियानेट न्यूज़, ब्यूरो चीफ और संपादक के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला खारिज
- अदालत
- केरल उच्च न्यायालय
- न्यायाधीश
- न्यायमूर्ति सी.एस. डियास
- मुख्य टिप्पणी
- प्रेस कॉन्फ्रेंस कवर करने वाले प्रसारक से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह पहले से जानता होगा कि क्या कहा जाएगा
- निर्णय संदर्भ
- 2026 LiveLaw (Ker) 425
पृष्ठभूमि
केरल उच्च न्यायालय ने हाल ही में एशियानेट न्यूज़, उसके ब्यूरो चीफ और संपादक के खिलाफ दर्ज आपराधिक मानहानि का मामला खारिज कर दिया। यह मामला चैनल द्वारा प्रसारित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कथित रूप से मानहानिकारक सामग्री प्रकाशित करने से संबंधित था।
न्यायमूर्ति सी.एस. डियास की पीठ ने कहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस को कवर करने वाले प्रसारक से सामान्यतः यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह पहले से जानता होगा कि वहां क्या कहा जाएगा। यह टिप्पणी मीडिया की स्वतंत्रता और आपराधिक दायित्व के बीच संतुलन के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
वर्तमान स्थिति
उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि किसी चैनल को आपराधिक मानहानि के लिए उत्तरदायी ठहराने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि चैनल की आपराधिक मंशा थी या उसकी सक्रिय भूमिका थी। केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस को प्रसारित करना, जिसमें मानहानिकारक शब्द कहे गए, चैनल को आपराधिक रूप से उत्तरदायी नहीं बनाता।
यह निर्णय 2026 LiveLaw (Ker) 425 के रूप में दर्ज किया गया है। इस फैसले से मीडिया संस्थानों को राहत मिली है, क्योंकि यह सीधे प्रसारण या लाइव कवरेज के दौरान अनियंत्रित बयानों के लिए चैनलों पर मुकदमा चलाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाता है।
प्रभाव
इस फैसले का सीधा असर समाचार चैनलों और डिजिटल मीडिया प्लेटफार्मों पर पड़ सकता है, जो अक्सर लाइव प्रेस कॉन्फ्रेंस या सार्वजनिक कार्यक्रमों का सीधा प्रसारण करते हैं। अब उन्हें इस बात की चिंता कम होगी कि किसी वक्ता द्वारा कहे गए विवादास्पद शब्दों के लिए उन पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है।
हालांकि, यह स्पष्ट है कि यदि चैनल की ओर से जानबूझकर मानहानिकारक सामग्री प्रसारित की जाती है या वह उसमें सक्रिय भूमिका निभाता है, तो आपराधिक दायित्व से बचाव संभव नहीं होगा। यह निर्णय पत्रकारों और मीडिया संपादकों के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है, लेकिन यह भी सुनिश्चित करता है कि दुरुपयोग की गुंजाइश न रहे।
भविष्य की संभावनाएं
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
यदि यह निर्णय उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जाती है, तो इस पर अंतिम फैसला आने तक मीडिया संस्थानों को अस्थायी राहत मिल सकती है। हालांकि, यदि उच्चतम न्यायालय इस व्याख्या को बरकरार रखता है, तो यह देश भर में समाचार चैनलों के लिए एक मिसाल बन सकता है।
संभावना है कि इस फैसले के बाद पत्रकारिता के पेशेवर मानकों को मजबूती मिलेगी, क्योंकि चैनलों को अपनी रिपोर्टिंग में अधिक सतर्कता बरतनी होगी। यदि भविष्य में कोई मामला सामने आता है, तो अदालतें यह देखेंगी कि क्या चैनल ने मानहानि को बढ़ावा दिया या उसमें भाग लिया, न कि केवल प्रसारण के तथ्य को आधार बनाकर मुकदमा चलाया जाएगा।
स्रोत: livelaw.in



