मुख्य तथ्य
- मामला
- 2,000 हेक्टेयर से अधिक संरक्षित वन भूमि का कथित अवैध हस्तांतरण
- नोटिस जारी
- एनजीटी की पूर्वी क्षेत्रीय पीठ ने निकोबार प्रशासन को नोटिस जारी किया
- कानून
- वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 की धारा 2
- पहली शिकायत
- प्रभागीय वन अधिकारी द्वारा 10 जून, 2025 को पत्र
- योजना
- मिशन अमृत सरोवर योजना के तहत रेनफेड तालाब
- स्थान
- निकोबार जिला, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
पृष्ठभूमि
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की पूर्वी क्षेत्रीय पीठ ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 2,000 हेक्टेयर से अधिक संरक्षित वन भूमि के कथित अवैध हस्तांतरण के मामले में निकोबार प्रशासन को नोटिस जारी किया है। यह मामला वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, जिसे वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 भी कहा जाता है, की धारा 2 के तहत केंद्र की पूर्व मंजूरी के बिना गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए संरक्षित वन भूमि के हस्तांतरण और आवंटन से संबंधित है।
यह मुद्दा सबसे पहले निकोबार प्रभाग के प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) ने 10 जून, 2025 को अंडमान लोक निर्माण विभाग के कार्यकारी अभियंता को लिखे एक पत्र में उठाया था। पत्र में कमोर्टा में रेनफेड तालाबों के प्रस्तावित निर्माण के संबंध में जानकारी दी गई थी। इसके बाद, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) के महानिरीक्षक (वन संरक्षण) को पत्र लिखकर वन संरक्षण अधिनियम की प्रयोज्यता पर स्पष्टीकरण मांगा था।
वर्तमान स्थिति
एनजीटी की पूर्वी क्षेत्रीय पीठ ने अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल द्वारा दायर याचिका के जवाब में यह नोटिस जारी किया है। याचिका में निकोबार में गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए संरक्षित वन भूमि के हस्तांतरण और आवंटन को उजागर किया गया था, जो केंद्र की पूर्व मंजूरी के बिना किया गया। पीठ में न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य ईश्वर सिंह शामिल थे।
इसके अलावा, अधिकरण ने उपायुक्त के उस निर्देश पर रोक लगा दी है जिसमें निकोबार प्रभाग के प्रभागीय वन अधिकारी के खिलाफ पुलिस कार्रवाई का आदेश दिया गया था। यह वन अधिकारी वही है जिसने सबसे पहले वन भूमि के कथित अवैध हस्तांतरण की सूचना दी थी। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, निकोबार जिले में 2,000 हेक्टेयर से अधिक संरक्षित वन भूमि को हाल के वर्षों में मिशन अमृत सरोवर योजना के तहत रेनफेड तालाबों के निर्माण के लिए विभिन्न स्थानों पर हस्तांतरित किया गया है।
| विवरण | मान |
|---|---|
| हस्तांतरित वन भूमि | 2,000 हेक्टेयर से अधिक |
| पहली शिकायत की तिथि | 10 जून, 2025 |
| कानून | वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 |
प्रभाव
इस मामले का सीधा असर निकोबार जिले के संरक्षित वन क्षेत्रों पर पड़ सकता है, जहां 2,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि को गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए हस्तांतरित किया गया है। यदि यह हस्तांतरण अवैध पाया जाता है, तो इससे वन पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान हो सकता है और स्थानीय जैव विविधता प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा, उपायुक्त द्वारा प्रभागीय वन अधिकारी के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के निर्देश पर रोक लगने से प्रशासनिक कार्यवाही पर फिलहाल रोक लग गई है। इससे वन अधिकारी को कथित अनियमितताओं को उजागर करने के लिए कानूनी संरक्षण मिला है, जबकि मामले की जांच जारी है।
आगे की संभावनाएं
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
यदि एनजीटी को मामले में दोष पाया जाता है, तो निकोबार प्रशासन को वन भूमि के हस्तांतरण के लिए केंद्र से पूर्व मंजूरी लेने या अवैध हस्तांतरण को रद्द करने का आदेश दिया जा सकता है। इससे भविष्य में इस तरह के हस्तांतरण पर रोक लग सकती है और वन संरक्षण कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित हो सकता है।
हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि मामले की सुनवाई कब होगी और अंतिम फैसला क्या होगा। यदि प्रशासन यह साबित कर देता है कि हस्तांतरण कानूनी रूप से किया गया था, तो मामला खारिज हो सकता है। लेकिन यदि अवैध पाया जाता है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है और वन भूमि को बहाल करने के आदेश दिए जा सकते हैं।
स्रोत: newindianexpress.com



