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येलोस्टोन के गर्म झरने से मिला सूक्ष्म जीव जिसने DNA जांच की दुनिया बदल दी

1966 में येलोस्टोन के गर्म झरने से एकत्र किए गए जीवाणु Thermus aquaticus से मिले एंजाइम Taq ने PCR तकनीक को संभव बनाया, जिससे आधुनिक DNA परीक्षण और फोरेंसिक जांच की नींव पड़ी।

मुख्य तथ्य

खोज का वर्ष
1966 में नमूना एकत्र, 1969 में प्रजाति का वर्णन
जीवाणु का नाम
Thermus aquaticus
एंजाइम
Taq पोलीमरेज़
PCR का आविष्कार
1983 में कैरी मुलिस द्वारा
व्यावसायिक अधिकार
1991 में रोश को 300 मिलियन डॉलर में बेचा गया
पुरस्कार
2013 में गोल्डन गूज़ अवार्ड

पृष्ठभूमि

1966 की गर्मियों में, इंडियाना विश्वविद्यालय के एक अंडरग्रेजुएट छात्र हडसन फ्रीज़ ने व्योमिंग के येलोस्टोन नेशनल पार्क में एक गर्म जलधारा के किनारे से गुलाबी रंग का कीचड़ एक प्लास्टिक की बोतल में भरा था। यह काम उनके प्रोफेसर थॉमस ब्रॉक के निर्देशन में हुआ, जो यह जानना चाहते थे कि क्या इतने गर्म पानी में कोई जीवन संभव है।

ब्रॉक ने 1964 में येलोस्टोन का दौरा किया था और गर्म झरनों में रंगीन चट्टानें देखी थीं, जो वास्तव में जीवित थीं। उस समय की पाठ्यपुस्तकों में बैक्टीरिया के लिए अधिकतम तापमान लगभग 55 डिग्री सेल्सियस माना जाता था। ब्रॉक और फ्रीज़ ने उबलते पानी में कांच की स्लाइडें डालीं और कुछ दिनों बाद उन पर जीवाणुओं की वृद्धि पाई। अप्रैल 1969 में उन्होंने जर्नल ऑफ बैक्टीरियोलॉजी में इस नई प्रजाति का वर्णन किया, जिसे उन्होंने Thermus aquaticus नाम दिया।

वर्तमान स्थिति

Thermus aquaticus से प्राप्त Taq एंजाइम ने पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन (PCR) तकनीक को क्रांतिकारी बना दिया। PCR में DNA को कई बार कॉपी करने के लिए नमूने को लगभग 95 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है, जिससे सामान्य एंजाइम नष्ट हो जाते हैं। 1983 में कैरी मुलिस ने PCR की अवधारणा विकसित की, लेकिन हर चक्र में एंजाइम को हाथ से बदलना पड़ता था।

1988 में साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में रैंडल साइकी और उनके सहयोगियों ने बताया कि Taq एंजाइम का उपयोग करके एकल-प्रति मानव DNA को दस मिलियन गुना से अधिक बढ़ाया जा सकता है। इस खोज के बाद PCR स्वचालित हो गया और DNA परीक्षण व्यापक रूप से संभव हो गया। मुलिस को 1993 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला।

प्रमुख घटनाएं और आंकड़े
वर्ष घटना विवरण
1964येलोस्टोन का दौराब्रॉक ने गर्म झरनों में जीवित चट्टानें देखीं
1966नमूना संग्रहफ्रीज़ ने गर्म पानी से कीचड़ एकत्र किया
1969प्रजाति का वर्णनThermus aquaticus का नामकरण
1983PCR का आविष्कारमुलिस ने तकनीक विकसित की
1988Taq का उपयोगसाइकी एट अल. ने PCR में Taq का इस्तेमाल किया
1991पेटेंट बिक्रीरोश को 300 मिलियन डॉलर में बेचा गया
1993नोबेल पुरस्कारमुलिस को रसायन विज्ञान में नोबेल मिला
1997डायवर्सा समझौतायेलोस्टोन ने पहला शोध समझौता किया
1999अदालती फैसलापेटेंट गलत तरीके से प्राप्त करने का आरोप
2013गोल्डन गूज़ अवार्डब्रॉक और फ्रीज़ को सम्मानित किया गया
स्रोत: spacedaily.com से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर

प्रभाव

Taq एंजाइम के कारण आधुनिक DNA फोरेंसिक जांच संभव हो पाई है। आपराधिक मामलों में, एक छोटे से धब्बे या क्षतिग्रस्त नमूने से भी DNA का विश्लेषण किया जा सकता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ जस्टिस के अनुसार, PCR की मदद से पिनहेड के आकार के नमूने से भी जांच संभव है।

इस तकनीक का उपयोग पितृत्व परीक्षण, प्रसवपूर्व जांच, कैंसर म्यूटेशन पैनल, वंशावली किट, पशु चिकित्सा निदान और कोविड-19 महामारी के दौरान लाखों नाक के स्वाब के परीक्षण में हुआ। ये सभी थर्मोस्टेबल पोलीमरेज़ पर निर्भर हैं, जो Thermus aquaticus से प्राप्त या उसी सिद्धांत पर विकसित किए गए हैं।

भविष्य की संभावनाएं

विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।

यदि Thermus aquaticus जैसे अत्यधिक ताप सहन करने वाले जीवों का अध्ययन जारी रहता है, तो भविष्य में और भी उपयोगी एंजाइम मिल सकते हैं जो औद्योगिक और चिकित्सा प्रक्रियाओं में क्रांति ला सकते हैं। हालांकि, यह अनिश्चित है कि ऐसी खोजें कब और कैसे होंगी।

यदि जैव विविधता से जुड़े लाभ-साझाकरण समझौते मजबूत होते हैं, तो राष्ट्रीय उद्यानों और अन्य प्राकृतिक स्थलों से प्राप्त संसाधनों का व्यावसायिक उपयोग अधिक नैतिक और न्यायसंगत हो सकता है। लेकिन इसके लिए नीतिगत बदलाव और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होगी।

स्रोत: spacedaily.com

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