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डिगबोई: शिक्षाविद् एवं समाजसेवी अनिल चंद्र सैकिया का निधन

डिगबोई के प्रख्यात शिक्षाविद् एवं समाजसेवी अनिल चंद्र सैकिया का सोमवार को निधन हो गया। वे असम मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के आईसीयू में उपचाराधीन थे।

मुख्य तथ्य

निधन का समय
सोमवार दोपहर 12:15 बजे
स्थान
असम मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (एएमसीएच), डिब्रूगढ़ का आईसीयू
पद
सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक, सौमार विद्यापीठ प्राथमिक विद्यालय
सम्मान
वाणिज्य शिक्षा में उत्कृष्टता के लिए राज्य पुरस्कार
शोक सभा
सोमवार शाम को सौमार विद्यापीठ में आयोजित

पृष्ठभूमि

असम के डिगबोई शहर में सोमवार को प्रख्यात शिक्षाविद्, समाजसेवी एवं जनप्रिय व्यक्तित्व अनिल चंद्र सैकिया का निधन हो गया। वे पिछले कई दिनों से उपचाराधीन थे और दोपहर करीब 12:15 बजे डिब्रूगढ़ स्थित असम मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (एएमसीएच) के गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में उन्होंने अंतिम सांस ली।

सैकिया सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक थे और सौमार विद्यापीठ प्राथमिक विद्यालय से जुड़े रहे। वाणिज्य शिक्षा में उत्कृष्टता के लिए राज्य पुरस्कार से सम्मानित सैकिया ने अपना पूरा जीवन युवा मस्तिष्कों के निर्माण और समाज की सेवा में समर्पित कर दिया था।

वर्तमान स्थिति

सैकिया के निधन से डिगबोई के शैक्षिक और सामाजिक इतिहास में एक युग का अंत हो गया है। उन्हें एक दयालु मार्गदर्शक, सम्मानित समाजसेवी और गहरे आध्यात्मिक व्यक्तित्व के रूप में याद किया जा रहा है।

सोमवार शाम को सौमार विद्यापीठ में सार्वजनिक शोक सभा और पुष्पांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। सैकिया के जीवन भर के कार्यक्षेत्र रहे इस संस्थान में सैकड़ों शोक संतप्त लोग, जिनमें प्रतिष्ठित नागरिक, शिक्षाविद्, पूर्व सहकर्मी, छात्र, शुभचिंतक और प्रशंसक शामिल थे, अंतिम विदाई देने के लिए एकत्र हुए।

प्रभाव

सैकिया के निधन से उनके परिवार, मित्रों और शिष्यों के अलावा डिगबोई का पूरा शैक्षिक समुदाय शोक में है। उनके द्वारा पढ़ाए गए छात्रों की कई पीढ़ियाँ उन्हें एक प्रेरणास्रोत के रूप में याद करेंगी।

सौमार विद्यापीठ, जहाँ उन्होंने प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य किया, उनके योगदान को कभी नहीं भूल पाएगा। उनके निधन से शहर के सामाजिक ताने-बाने में एक ऐसा खालीपन आ गया है जिसे भरना मुश्किल होगा।

भविष्य की संभावनाएँ

विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।

सैकिया के निधन के बाद यह देखना होगा कि उनके द्वारा स्थापित शैक्षिक और सामाजिक मूल्यों को आगे कैसे बढ़ाया जाता है। यदि उनके शिष्य और समाजसेवी साथी उनके आदर्शों को अपनाएँ, तो उनकी विरासत जीवित रह सकती है।

हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि उनके निधन के बाद कोई औपचारिक स्मृति कार्यक्रम या संस्थागत पहल होगी या नहीं। यदि स्थानीय प्रशासन या शैक्षिक संस्थान पहल करें, तो उनके योगदान को स्थायी रूप से सम्मानित किया जा सकता है।

स्रोत: sentinelassam.com

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