मुख्य तथ्य
- तारीख
- 5 अगस्त
- भारत का दृष्टिकोण
- 2019 के संवैधानिक परिवर्तनों की वर्षगांठ
- पाकिस्तान का दृष्टिकोण
- यौम-ए-इस्तेहसाल (शोषण दिवस)
- रेलवे परियोजना
- उधमपुर-श्रीनगर-बारामुला लाइन, जून 2025 में वंदे भारत सेवा
- पर्यटक आंकड़ा
- एक वर्ष में दो करोड़ से अधिक पर्यटक
- पीओजेके में विरोध
- बिजली दरों, सब्सिडी वाले आटे और मुद्रास्फीति के खिलाफ आंदोलन
पृष्ठभूमि
नई दिल्ली, 4 अगस्त (आईएएनएस)। उपमहाद्वीप के कैलेंडर में कुछ ऐसी तारीखें हैं जिन्हें दो राष्ट्र इतनी विपरीत भावना से मनाते हैं। 5 अगस्त को भारत 2019 के संवैधानिक परिवर्तनों की वर्षगांठ मनाता है, जिसने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर उसे भारतीय संघ में पूरी तरह एकीकृत कर दिया।
उसी दिन, सीमा पार, पाकिस्तान इसे 'यौम-ए-इस्तेहसाल' यानी शोषण दिवस के रूप में मनाता है, और इस एकीकरण को कश्मीरियों के खिलाफ दमन के रूप में पेश करता है। दो पड़ोसी, एक तारीख, और दो पूरी तरह से असंगत कहानियाँ। सात साल बाद पूछने लायक सवाल यह है कि ज़मीन पर किसकी कहानी को समर्थन मिलता है।
वर्तमान स्थिति
जम्मू-कश्मीर में, भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 2019 के बाद से केंद्र शासित प्रदेश में हजारों करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव आए हैं। सबसे दृश्यमान परिवर्तन रेलवे है। उधमपुर-श्रीनगर-बारामुला रेलवे लाइन, जिसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया है, अब कश्मीर घाटी को पहली बार देश के बाकी हिस्सों से जोड़ती है। यह दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे पुल के जरिए चिनाब नदी को पार करती है, और जून 2025 में वंदे भारत सेवा शुरू की गई थी।
रेलवे के अलावा, जम्मू में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) और भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के नए परिसर स्थापित हुए हैं। पर्यटन के पारंपरिक क्षेत्र में रिकॉर्ड संख्या में पर्यटक आए, सरकारी आंकड़ों के अनुसार एक हालिया वर्ष में दो करोड़ से अधिक पर्यटक आए। हालांकि, अप्रैल 2025 में पहलगाम हमले ने सुरक्षा चुनौतियों की याद दिलाई और पर्यटन सीजन को बाधित किया।
| पहलू | भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर | पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर |
|---|---|---|
| निवेश | हजारों करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव | आर्थिक कठिनाई, विरोध |
| बुनियादी ढांचा | रेलवे, एम्स, आईआईएम, आईआईटी | बिजली उत्पादन के बावजूद उच्च दरें |
| लोकतांत्रिक प्रक्रिया | पंचायत, डीडीसी, विधानसभा चुनाव | चुनाव को 'कॉस्मेटिक' बताया गया |
| लोक व्यवस्था | पहलगाम हमले के बावजूद सामान्यीकरण | कर्फ्यू, संचार बंदी, बल प्रयोग |
प्रभाव
ग्रामीण स्तर पर पंचायत और जिला विकास परिषद चुनावों के बाद 2024 के विधानसभा चुनावों ने निर्णय लेने की प्रक्रिया निर्वाचित स्थानीय प्रतिनिधियों को सौंप दी है, जिनमें युवा और महिलाएं पहली बार सार्वजनिक जीवन में शामिल हुई हैं। यह किसी अधीनस्थ क्षेत्र की निशानी नहीं है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में पिछले तीन वर्षों से लगातार जन आंदोलन हो रहे हैं, जो आर्थिक कठिनाई और राजनीतिक शक्तिहीनता के खिलाफ हैं। स्थानीय व्यापारियों और नागरिक समितियों के अनुसार, पीओजेके में उत्पन्न जलविद्युत के बावजूद लोगों को क्षेत्र में सबसे अधिक बिजली दरों का सामना करना पड़ता है, जबकि बिजली राष्ट्रीय ग्रिड को बेची जाती है। सब्सिडी वाले गेहूं के आटे, मुद्रास्फीति से राहत और अधिकारियों के विशेषाधिकारों को समाप्त करने की मांगें उठ रही हैं।
भविष्य की संभावनाएं
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
यदि भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में विकास और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का क्रम जारी रहता है, तो क्षेत्र में स्थिरता और आर्थिक प्रगति की संभावना है, बशर्ते सुरक्षा चुनौतियों का समाधान होता रहे। हालांकि, पहलगाम जैसी घटनाएं दिखाती हैं कि सामान्यीकरण अधूरा है।
पाकिस्तान-अधिकृत क्षेत्र में, यदि प्रशासन आर्थिक मांगों को दबाने के लिए बल प्रयोग और संचार बंदी जारी रखता है, तो असंतोष और बढ़ सकता है। यदि पाकिस्तान संवाद और राहत के उपाय करता है, तो स्थिति में सुधार संभव है, लेकिन फिलहाल इसके संकेत नहीं हैं। दोनों देशों की कहानियों का मूल्यांकन जनता के अनुभवों से ही होगा।
स्रोत: ianslive.in



