मुख्य तथ्य
- जारी करने की तिथि
- 31 जुलाई 2026
- प्रभावी तिथि
- तुरंत प्रभाव से
- लागू
- वाणिज्यिक बैंक (स्मॉल फाइनेंस बैंक, पेमेंट बैंक और लोकल एरिया बैंक को छोड़कर)
- कानूनी आधार
- बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 30(1A); बैंकिंग कंपनियों (अधिग्रहण और हस्तांतरण) अधिनियम, 1970/1980 की धारा 10(1); SBI अधिनियम, 1955 की धारा 41(1)
- उद्देश्य
- सांविधिक केंद्रीय लेखापरीक्षकों (SCAs) / सांविधिक लेखापरीक्षकों (SAs) की नियुक्ति/पुनर्नियुक्ति के लिए दिशानिर्देश
पृष्ठभूमि
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 31 जुलाई 2026 को 'रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (वाणिज्यिक बैंक – सांविधिक लेखापरीक्षा) निदेश, 2026' जारी किए। ये निदेश बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 30(1A), बैंकिंग कंपनियों (अधिग्रहण और हस्तांतरण) अधिनियम, 1970/1980 की धारा 10(1), और भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 की धारा 41(1) के तहत जारी किए गए हैं।
RBI ने इन निदेशों को सार्वजनिक हित में आवश्यक और समीचीन मानते हुए जारी किया है। ये निदेश वाणिज्यिक बैंकों पर लागू होंगे, जिनमें बैंकिंग कंपनियां (स्मॉल फाइनेंस बैंक, पेमेंट बैंक और लोकल एरिया बैंक को छोड़कर), संवर्त नए बैंक और भारतीय स्टेट बैंक शामिल हैं।
निदेशों का उद्देश्य सांविधिक केंद्रीय लेखापरीक्षकों (SCAs) और सांविधिक लेखापरीक्षकों (SAs) की नियुक्ति/पुनर्नियुक्ति के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रदान करना है। ये निदेश तुरंत प्रभाव से लागू होंगे।
वर्तमान स्थिति
निदेशों में कहा गया है कि 'वाणिज्यिक बैंक' शब्द बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 5 के खंड (c), (da) और (nc) में परिभाषित बैंकिंग कंपनियों, संवर्त नए बैंकों और भारतीय स्टेट बैंक को संदर्भित करता है। हालांकि, ये निदेश स्मॉल फाइनेंस बैंक, पेमेंट बैंक और लोकल एरिया बैंक पर लागू नहीं होंगे।
निदेशों में SCAs और SAs की परिभाषा स्पष्ट की गई है। SCAs उन बैंकों पर लागू होते हैं जो अलग से सांविधिक शाखा लेखापरीक्षक (SBAs) नियुक्त करते हैं, जबकि अन्य मामलों में SAs शब्द लागू होगा।
निदेशों में विभिन्न शर्तों को परिभाषित किया गया है, जिनमें ऑल इंडिया फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस (AIFIs), ऑडिट फर्म, सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक, ग्रुप एंटिटी, लार्ज एक्सपोजर, NBFCs, प्राइमरी (अर्बन) को-ऑपरेटिव बैंक, पब्लिक सेक्टर बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक शामिल हैं।
| श्रेणी | परिभाषा |
|---|---|
| बैंकिंग कंपनियां | बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 5 के खंड (c) के अनुसार |
| संवर्त नए बैंक | बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 5 के खंड (da) के अनुसार |
| भारतीय स्टेट बैंक | बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 5 के खंड (nc) के अनुसार |
प्रभाव
इन निदेशों का सीधा प्रभाव वाणिज्यिक बैंकों और उनके लेखापरीक्षकों पर पड़ेगा। बैंकों को अपने सांविधिक लेखापरीक्षकों की नियुक्ति, पुनर्नियुक्ति और कार्यकाल के संबंध में नए मानदंडों का पालन करना होगा।
लेखापरीक्षा फर्मों को पात्रता, स्वतंत्रता और पेशेवर मानकों से संबंधित आवश्यकताओं को पूरा करना होगा। इससे लेखापरीक्षा फर्मों के चयन की प्रक्रिया में बदलाव आ सकता है।
निदेशों में लेखापरीक्षा शुल्क और व्यय से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं, जिससे बैंकों की लेखापरीक्षा लागत प्रभावित हो सकती है। हालांकि, विस्तृत प्रावधानों को समझने के लिए पूर्ण पाठ की आवश्यकता होगी।
भविष्य का परिदृश्य
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
यदि बैंक इन निदेशों का पालन करते हैं, तो लेखापरीक्षा प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही आ सकती है। इससे बैंकिंग प्रणाली में निवेशकों का विश्वास बढ़ सकता है।
हालांकि, नए मानदंडों के कारण लेखापरीक्षा फर्मों के लिए अनुपालन लागत बढ़ सकती है, जिससे छोटी फर्मों पर दबाव पड़ सकता है। यदि ऐसा होता है, तो बाजार में लेखापरीक्षा फर्मों का एकीकरण देखने को मिल सकता है।
आगे, RBI इन निदेशों के कार्यान्वयन की निगरानी कर सकता है और यदि आवश्यक हुआ तो संशोधन कर सकता है। फिलहाल, इन निदेशों का पूर्ण प्रभाव स्पष्ट नहीं है और यह देखना होगा कि बैंक और लेखापरीक्षा फर्म इन्हें कैसे अपनाते हैं।
स्रोत: Reserve Bank of India
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लागू बैंकों की श्रेणियाँ
भारतीय स्टेट बैंक1 श्रेणियाँ
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| श्रेणी | श्रेणियाँ |
|---|---|
| बैंकिंग कंपनियां | 1 श्रेणियाँ |
| संवर्त नए बैंक | 1 श्रेणियाँ |
| भारतीय स्टेट बैंक | 1 श्रेणियाँ |
स्रोत:स्रोत: RBI निदेश, 2026 स्रोत-समर्थित



