हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के सुदूर पांगी घाटी में इस साल क्लाउडबर्स्ट, फ्लैशफ्लड और भूस्खलन की घटनाओं ने व्यापक तबाही मचाई है। सड़कें और पुल बह गए, खेत बर्बाद हो गए, घर क्षतिग्रस्त हुए और कई गांव अलग-थलग पड़ गए। यह घाटी पीर पंजाल और ज़ांस्कर पर्वतमालाओं के बीच स्थित है, जो इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून से बचाती थी, लेकिन अब यहां मौसम का मिजाज बदल गया है।
वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले तीन दशकों में पांगी घाटी में पारिस्थितिकी तंत्र में बड़े बदलाव हुए हैं। स्थायी बर्फ का आवरण 68% से अधिक घट गया है, जबकि वन क्षेत्र और चारागाहों में लगभग 21% की गिरावट आई है। लगभग 175 वर्ग किलोमीटर अल्पाइन चारागाह बंजर भूमि में बदल गए हैं, जिसका मुख्य कारण सड़क निर्माण और ढलानों का कटाव है।
स्थानीय निवासियों के मुताबिक, सर्दियों में बर्फबारी पहले 5 से 15 फीट तक होती थी, जो अब घटकर 2 से 8 फीट रह गई है। गर्मियां अधिक गर्म हो गई हैं, बारिश का पैटर्न अनियमित हो गया है, और क्लाउडबर्स्ट जैसी घटनाएं अब आम हो गई हैं। ये बदलाव जलवायु परिवर्तन और विकास परियोजनाओं के संयुक्त प्रभाव के संकेत हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने से घाटी के ऊपरी हिस्सों में नई ग्लेशियल झीलें बन रही हैं, जिनसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा बढ़ गया है। सैटेलाइट तस्वीरों में नदी के मार्गों के चौड़े होने और जल निकायों के विस्तार के संकेत मिले हैं। पांगी घाटी का अनुभव हिमालय के अन्य क्षेत्रों के लिए भी चेतावनी है, जहां जलवायु परिवर्तन और अनियोजित विकास के कारण बर्फीले परिदृश्य आपदा-प्रवण क्षेत्रों में बदल रहे हैं।
स्रोत: tribuneindia.com



