मुख्य तथ्य
- समिति की अध्यक्षता
- DGHS डॉ. लवनीश जी. कृष्णा
- समिति के सदस्य
- 11 अन्य सदस्य
- रिपोर्ट की समय सीमा
- आठ सप्ताह
- खाली सीटों का अनुमान
- लगभग 20,000
- अतिरिक्त पात्र उम्मीदवार (सरकार के अनुसार)
- एक लाख से अधिक
- अतिरिक्त पात्र उम्मीदवार (NBEMS के अनुसार)
- 95,913
पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें NEET-PG 2025-26 परीक्षा के लिए योग्यता कट-ऑफ प्रतिशत को काफी कम किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है। याचिका अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत द्वारा दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि परिणाम घोषित होने और काउंसलिंग के दो दौर पूरे होने के बाद योग्यता मानकों को असामान्य रूप से कम, शून्य या नकारात्मक प्रतिशत तक कम करना मनमाना और असंवैधानिक है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि ऐसे स्कोर वाले उम्मीदवारों को स्नातकोत्तर चिकित्सा प्रशिक्षण में प्रवेश देना मरीजों की सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा की अखंडता से समझौता करता है। याचिका के अनुसार, चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद 'खेल के नियमों' को नहीं बदला जा सकता।
वर्तमान स्थिति
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि अदालत के निर्देश के अनुपालन में विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया है। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ के समक्ष ASG ने कहा, "हमने आपके निर्देशानुसार समिति का गठन किया है। हम यह कार्य करेंगे और रिपोर्ट सौंपेंगे।"
ASG भाटी ने बताया कि समिति की अध्यक्षता महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएं (DGHS) करेंगे और इसमें 11 अन्य सदस्य शामिल हैं। अदालत ने DGHS द्वारा 23 जुलाई को जारी कार्यालय आदेश को रिकॉर्ड पर लिया, जो समिति के गठन से संबंधित है। समिति को आठ सप्ताह में रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।
समिति में DGHS, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (NBE), राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC), राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA), केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। समिति को NEET परीक्षा के माध्यम से मौजूदा प्रवेश प्रणाली का व्यापक ऑडिट करने, कमियों की पहचान करने और व्यावहारिक समाधान सुझाने का कार्य सौंपा गया है।
| विवरण | संख्या |
|---|---|
| खाली सीटों का अनुमान | लगभग 20,000 |
| अतिरिक्त पात्र उम्मीदवार (सरकार का दावा) | एक लाख से अधिक |
| अतिरिक्त पात्र उम्मीदवार (NBEMS का आंकड़ा) | 95,913 |
प्रभाव
केंद्र सरकार ने कट-ऑफ में कटौती का बचाव करते हुए कहा है कि यह निर्णय विशेषज्ञ निकायों द्वारा विस्तृत विचार-विमर्श के बाद लिया गया था, क्योंकि देशभर में लगभग 20,000 स्नातकोत्तर चिकित्सा सीटें खाली रहने की संभावना थी। सरकार का कहना है कि इस कदम से स्वास्थ्य अवसंरचना का इष्टतम उपयोग सुनिश्चित होगा।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के हलफनामे के अनुसार, इस निर्णय से एक लाख से अधिक अतिरिक्त उम्मीदवार तीसरे दौर की काउंसलिंग के लिए पात्र हो गए हैं, बिना अंतर-मेरिट में बदलाव किए। वहीं, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (NBEMS) ने स्पष्ट किया है कि कट-ऑफ कम करने के निर्णय में उसकी कोई भूमिका नहीं थी, और संशोधित कट-ऑफ के कारण 95,913 अतिरिक्त उम्मीदवार काउंसलिंग के लिए पात्र हुए हैं।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस तरह के कदम से चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की कार्रवाई तय होगी।
भविष्य की संभावनाएं
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
विशेषज्ञ समिति को आठ सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सौंपनी है। यदि समिति प्रवेश प्रणाली में खामियां पाती है, तो सुप्रीम कोर्ट कट-ऑफ कम करने के फैसले पर पुनर्विचार कर सकता है या भविष्य के लिए नए दिशानिर्देश जारी कर सकता है।
यदि समिति सरकार के फैसले को सही ठहराती है, तो मौजूदा कट-ऑफ बरकरार रह सकता है और तीसरे दौर की काउंसलिंग आगे बढ़ सकती है। हालांकि, यदि समिति कट-ऑफ में और बदलाव की सिफारिश करती है, तो प्रवेश प्रक्रिया में देरी हो सकती है।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई आठ सप्ताह बाद तय की है। तब तक समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की दिशा स्पष्ट हो पाएगी।
स्रोत: prokerala.com



